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January 20, 2026 5:18 am

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विकसित भारत–गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) [VB–GRAMG] बिल, 2025 के विरोध में अरावली निर्माण मजदूर सुरक्षा संघ शाखा गोगुंदा और सायरा ने सौंपा राष्ट्रपति के नाम उपखंड अधिकारी को ज्ञापन

प्राइम टाइम/गोगुंदा: अरावली निर्माण मजदूर सुरक्षा संघ शाखा गोगुंदा और सायरा द्वारा आज संगठन बैठक के बाद विकसित भारत–गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) [VB–GRAMG] बिल, 2025 के कड़े विरोध और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (MGNREGA), 2005 को फिर से बहाल करने के लिए राष्ट्रपति के नाम उपखण्ड अधिकारी शुभम बैसारे और सायरा में तहसीलदार को ज्ञापन सौंपा गया।
ज्ञापन में नरेगा कानून को बहाल करने की मांग करते हुए बताया गया कि यह एक मांग-आधारित, सार्वभौमिक और विकेंद्रीकृत कानून है, जिसने करोड़ों ग्रामीण परिवारों—खासतौर पर महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और भूमिहीन मज़दूरों—को जीवन का सहारा दिया है।
VB GRAMG बिल काम के अधिकार को समाप्त कर देता है और उसे केंद्र-सरकार-नियंत्रित “योजना” बनाता है। काम के क्षेत्र, काम के प्रकार और बजट—सब कुछ दिल्ली से तय होगा। राज्य-वार “मानक आवंटन” तय कर यह नरेगा कानून के मांग आधारित भावना पर हमला है यानी पहले बजट, फिर काम। 125 दिनों का वादा खोखला है, क्योंकि जब देश भर में 100 दिन की कानूनी गारंटी केवल 7 प्रतिशत परिवारों ने पूरी की है और हर साल औसतन 50 दिन का काम ही मिल रहा हैं, तब यह केवल भ्रम पैदा करता है। ग्राम सभा और पंचायतें केवल डेटा एंट्री केंद्र बन जाएँगी। काम की योजना दिल्ली में बैठकर बनाई जाएगी तो ग्राम स्वराज्य का सपना कैसे साकार होगा। यह 73वें संविधान संशोधन और स्थानीय स्वशासन पर सीधा हमला है। 60:40 लागत-साझेदारी के तहत मज़दूरी का बड़ा हिस्सा राज्यों पर डाल दिया गया है। गरीब राज्य यह बोझ नहीं उठा पाएँगे। इसका परिणाम होगा कि योजना ठप होगी, मज़दूर बेरोज़गार होंगे, पलायन और बढ़ेगा। कृषि मौसम में 60 दिनों तक मनरेगा काम पर तालाबंदी करने का प्रावधान, भूमिहीन मज़दूरों, महिलाओं, दलितों और आदिवासियों पर सीधा हमला है और मजदूरी दर दबाने का साधन बनेगा। ऊपर से, बायोमेट्रिक और डिजिटल निगरानी के ज़रिये सामाजिक जवाबदेही की जगह तकनीकी नियंत्रण थोप दिया गया है।

यह विधेयक मज़दूरों, ग्राम सभाओं और श्रमिक संगठनों से बिना किसी सलाह-मशविरे के लाया गया है। यह Right to Work नहीं, बल्कि एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जो राज्यों के पास पैसे न होने से जल्दी दम तोड़ देगी। न हमें मनरेगा कानून के नाम में परिवर्तन चाहिए, न काम में।

अतः हम मांग करते हैं कि VB–GRAMG बिल को तुरंत वापस लिया जाए। मनरेगा मज़दूरी दर बढ़ाई जाए और मनरेगा के मूल अधिकार-आधारित स्वरूप को बनाए रखा जाए । ज्ञापन देते समय संगठन से गणेश लाल , शंकर लाल, वालूराम, पन्नालाल, सुजाता, मिरकी बाई, सुरता राम, भावेश, पूजा, धर्मराज मौजूद रहे।

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