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August 28, 2026 12:35 pm

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मेवाड़ की 155 वर्ष पुरानी परंपरा को डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने रखा जीवंत

कविराव परिवार की हवेली पर मोखाण पधारकर जताई आत्मीय संवेदना, रंग बदलाई दस्तूर में पाग व सरोपाव की परंपरा निभाई

उदयपुर, 18 अगस्त। मेवाड़ के राजपरिवार और प्रमुख सहयोगी परिवारों के बीच सदियों से चली आ रही आत्मीयता एवं सुख-दुःख में सहभागी होने की परंपरा का निर्वहन करते हुए मेवाड़ के 77 वे श्री एकलिंग दीवान डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ उदयपुर स्थित बडलिया हवेली पर मोखाण पधारे। यह हवेली स्वर्गीय राव बख्तावर सिंह के परिवार से संबंधित है।

डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने राव गजेन्द्र सिंह एवं उनके पुत्र राव अक्षय सिंह से मुलाकात कर दिवंगत परिजन के निधन पर अपनी संवेदना व्यक्त की। उन्होंने दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए शोकाकुल परिवार को इस कठिन घड़ी में धैर्य प्रदान करने की कामना की। इस अवसर पर राव परिवार के सदस्यों को पान बीड़ा देकर सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन किया गया।

कार्यक्रम के दौरान रंग बदलाई दस्तूर की परंपरा भी निभाई गई। डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने राव नरेन्द्र सिंह को रंग की पाग पहनाई। वहीं शास्त्रीजी ने राव गजेन्द्र सिंह, राव महेंद्र सिंह एवं राव अक्षय सिंह को रंग की पाग पहनाई। श्रीजी हुजूर की ओर से राव परिवार के सदस्यों को सरोपाव भी प्रदान किए गए।

ऐतिहासिक बहियों में दर्ज है परंपरा

मेवाड़ के इतिहास में राजपरिवार और कविराव परिवार के आत्मीय संबंधों का उल्लेख मिलता है। ऐतिहासिक बहियों के अनुसार 13 जुलाई 1871 को मेवाड़ के 71वें श्री एकलिंग दीवान महाराणा शम्भूसिंह जी, कविराव बख्तावर सिंह की माताजी के देहावसान पर हवेली मोखाण पधारे थे।

इसके बाद 22 अप्रैल 1894 को मेवाड़ के 73वें श्री एकलिंग दीवान महाराणा फतहसिंह जी, कविराव बख्तावर सिंह के देहावसान के पश्चात उनके पुत्र गोविन्द सिंह के मोखाण पधारे थे।

इसी क्रम में वर्ष 1964 में मेवाड़ के 75 वें श्री एकलिंग दीवान महाराणा भगवतसिंह मेवाड़ ने कविराव बख्तावर सिंह के पौत्र कविराव मोहन सिंह के देहावसान पर हवेली पहुंचकर अपनी आत्मीय संवेदना व्यक्त की थी।

वर्ष 2026 में डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ का कविराव परिवार की हवेली पर मोखाण पधारना इसी ऐतिहासिक परंपरा की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है। यह अवसर केवल शोक-संवेदना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मेवाड़ की उस जीवंत परंपरा का प्रतीक बना, जिसमें राजपरिवार अपने आत्मीय एवं सहयोगी परिवारों के सुख-दुःख में सदैव सहभागी रहा है।

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