खनन पूरा होने के बाद कार्रवाई को लेकर सवाल, हाईवे किनारे पहाड़ियों की कटाई पर निगरानी व्यवस्था कठघरे में; दादिया में चारागाह भूमि से पत्थर निकालने के आरोपों पर भी कार्रवाई का इंतजार
गोगुंदा। उदयपुर-पिंडवाड़ा राष्ट्रीय राजमार्ग से सटे गोगुंदा क्षेत्र में कथित अवैध खनन का मामला अब कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। खाखड़ी गांव में करीब 17 हजार टन मिट्टी-पत्थर के अवैध खनन के मामले में खनन विभाग की शिकायत पर तीन भू-स्वामियों और ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। लेकिन इस पूरे प्रकरण में सवाल केवल इतना नहीं है कि खनन किसने किया, बल्कि यह भी है कि जब इतने बड़े पैमाने पर खनन हो रहा था, तब शिकायतकर्ता और जिम्मेदार विभाग कहां थे? यदि खनन पूरा होने के इतने दिन बाद मामला सामने आया, तो पहले इसकी शिकायत क्यों नहीं हुई और विभाग को इसकी जानकारी कब मिली?
खनन विभाग की जांच में खाखड़ी गांव के दो खसरों में करीब 15 हजार टन मिट्टी और 2 हजार टन पत्थर का बिना वैध अनुमति खनन किए जाने का मामला सामने आया है। विभाग की शिकायत के आधार पर पुलिस ने नारायण लाल पालीवाल निवासी बड़ी जोशियां की भागल, जसवंतगढ़, कैलाश चंद्र सोनी निवासी गोगुंदा और गोपाल सोनी निवासी गोगुंदा के खिलाफ मामला दर्ज किया है। संबंधित ठेकेदार को भी आरोपी बनाया गया है। मामले में आरोपों की पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद होगी।
खनन पूरा होने के बाद कार्रवाई, पहले क्यों नहीं लगी भनक?
जानकारी के अनुसार, शिकायतकर्ताओं ने 7 अक्टूबर को उदयपुर स्थित खनिज अभियंता कार्यालय में लिखित शिकायत दी थी। इसके बाद खनन विभाग की टीम ने 7 और 8 अक्टूबर को मौके पर जांच की। जांच में कथित अवैध खनन सामने आने के बाद पुलिस में मामला दर्ज कराया गया।
लेकिन इस घटनाक्रम ने निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि खनन पहले ही पूरा हो चुका था, तो संबंधित विभागों को इसकी जानकारी कब मिली? क्या खनन के दौरान मौके का निरीक्षण किया गया था? क्या शिकायतकर्ताओं को पहले से इसकी जानकारी थी? यदि जानकारी थी, तो शिकायत करने में इतना समय क्यों लगा? और यदि विभाग को पहले जानकारी नहीं थी, तो इतने बड़े पैमाने पर खनन गतिविधि उसकी नजरों से कैसे बची रही?
इन सवालों का जवाब शिकायत की तारीख, खनन की वास्तविक अवधि और विभागीय निरीक्षण के रिकॉर्ड से ही सामने आ सकता है। इसलिए प्रशासन को पूरे घटनाक्रम की समयरेखा स्पष्ट करनी चाहिए।
हाईवे किनारे खनन, फिर निगरानी किसकी जिम्मेदारी?
खाखड़ी प्रकरण में कथित तौर पर निकाली गई मिट्टी का उपयोग राष्ट्रीय राजमार्ग पर बन रहे ओवरब्रिज के निर्माण में किए जाने की बात भी सामने आई है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि मिट्टी कहां से लाई गई, उसके खनन और परिवहन की वैध अनुमति थी या नहीं और संबंधित अधिकारियों ने इसकी जांच कब की।

क्या जिम्मेदार अधिकारियों को मिट्टी के स्रोत की जानकारी पहले से थी? यदि थी, तो अनुमति और संबंधित रिकॉर्ड की जांच समय रहते क्यों नहीं हुई? और यदि जानकारी नहीं थी, तो निर्माण कार्य की निगरानी व्यवस्था में इस पहलू की जांच कैसे हुई?
इन सवालों पर संबंधित विभागों और निर्माण कार्य से जुड़े पक्षों का आधिकारिक जवाब सामने आना चाहिए। बिना प्रमाण किसी अधिकारी की भूमिका पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन निगरानी व्यवस्था की जांच जरूरी है।
खाखड़ी के साथ दादिया का मामला भी जांच के दायरे में आए
खाखड़ी में एफआईआर दर्ज होने के बीच गोगुंदा उपखंड के दादिया गांव में चारागाह भूमि से लाखों टन पत्थर निकालकर बेचने के आरोप भी सामने आए हैं। स्थानीय स्तर पर दावा किया जा रहा है कि इस मामले में राजस्व विभाग और खनन विभाग कई बार कार्रवाई कर चुके हैं, लेकिन अब तक किसी आरोपी को नामजद नहीं किया जा सका। आरोप यह भी हैं कि वहां अभी भी खनन जारी है।

यदि पूर्व में कार्रवाई हुई है, तो उसकी रिपोर्ट में क्या सामने आया? क्या पत्थर की मात्रा का आकलन हुआ? क्या संबंधित लोगों की पहचान की गई? और यदि खनन जारी है, तो उसे रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए? इन सवालों का जवाब भी प्रशासन को देना चाहिए।
दादिया का मामला यह सवाल उठाता है कि क्या खनन विभाग पूरे उपखंड में समान रूप से निगरानी कर रहा है। खाखड़ी के साथ-साथ दादिया और हाईवे से सटे अन्य गांवों में भी खनन गतिविधियों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
पहाड़ियां छलनी हो रही हैं तो कार्रवाई कहां?
स्थानीय स्तर पर खाखड़ी सहित हाईवे से सटे कई गांवों में पहाड़ियों की कटाई और कथित अवैध खनन को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसे में खनन विभाग को पूरे क्षेत्र में नियमित निरीक्षण कराना चाहिए। जहां भी बिना वैध अनुमति खनन के प्रमाण मिलें, वहां नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

सवाल यह है कि क्या विभाग केवल शिकायत मिलने के बाद सक्रिय होता है, या अवैध खनन रोकने के लिए पहले से भी निगरानी करता है? यदि किसी स्थान पर पहले कार्रवाई के बावजूद गतिविधि जारी रहने के प्रमाण मिलते हैं, तो यह भी जांचना जरूरी है कि रोकथाम के उपाय प्रभावी क्यों नहीं रहे।
जनता के सामने पांच बड़े सवाल
- खाखड़ी में कथित अवैध खनन के दौरान शिकायतकर्ताओं और संबंधित विभागों को इसकी जानकारी कब मिली?
- खनन पूरा होने के इतने दिन बाद शिकायत और कार्रवाई होने की वजह क्या है?
- ओवरब्रिज के निर्माण में उपयोग की गई मिट्टी के स्रोत और वैधता की जांच हुई या नहीं?
- दादिया की चारागाह भूमि से पत्थर निकालने के आरोपों और पूर्व कार्रवाइयों का परिणाम क्या रहा?
- क्या खनन विभाग पूरे गोगुंदा उपखंड में एक समान निगरानी करेगा और संभावित लापरवाही की भी जांच होगी?
अब केवल FIR नहीं, जवाबदेही भी जरूरी
खाखड़ी में एफआईआर दर्ज होना जांच की शुरुआत है। अब यह स्पष्ट होना चाहिए कि कथित खनन कब हुआ, विभाग को इसकी जानकारी कब मिली और निगरानी व्यवस्था ने क्या भूमिका निभाई। दादिया सहित अन्य गांवों में उठ रहे सवालों की भी जांच होनी चाहिए, ताकि सरकारी भूमि और पहाड़ियों को संभावित नुकसान से बचाया जा सके।
जनता का सवाल सीधा है—यदि अवैध खनन हुआ, तो क्या कार्रवाई केवल खनन में नामजद लोगों तक सीमित रहेगी, या यह भी जांच होगी कि इसे समय रहते रोकने की जिम्मेदारी निभाने वाले विभागों की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी थी? प्रशासन को अब तथ्यों और रिकॉर्ड के आधार पर इन सवालों का जवाब देना चाहिए।