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October 25, 2026 2:05 am

उदयपुर नगर निगम चुनाव में कांग्रेस की हार का पोस्टमार्टम: बागी, कमजोर टिकट और वोटों का बिखराव बना बड़ी वजह

कहीं बागियों ने बिगाड़ा गणित तो कहीं कमजोर टिकट पड़ा भारी, पांच वार्डों में 100 से भी कम वोटों से हार; BAP और निर्दलीयों ने भी कई सीटों पर मुकाबला बनाया त्रिकोणीय

उदयपुर। नगर निगम चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस की हार का वार्डवार विश्लेषण कई अहम तस्वीरें सामने ला रहा है। चुनाव में भाजपा की मजबूती के साथ-साथ कांग्रेस के सामने बागी उम्मीदवार, टिकट चयन, निर्दलीयों की मौजूदगी और BAP के प्रभाव जैसी चुनौतियां भी दिखाई दीं। कई वार्डों में कांग्रेस बेहद कम अंतर से चुनाव हारी, जबकि कुछ जगह पार्टी से जुड़े बागी उम्मीदवारों ने अधिकृत प्रत्याशियों के वोटों को प्रभावित किया।

कांग्रेस ने सभी 80 वार्डों में प्रत्याशी उतारे थे। चुनाव से पहले पार्टी ने कई वार्डों में नए और युवा चेहरों पर दांव लगाया था। हालांकि परिणाम आने के बाद कुछ सीटों पर उम्मीदवार चयन को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

पांच वार्डों में मामूली अंतर से फिसली जीत

कांग्रेस के लिए सबसे ज्यादा चिंता उन वार्डों की है, जहां जीत कुछ ही वोटों के अंतर से हाथ से निकल गई।

वार्ड 5 में कांग्रेस के रवि सुखवाल महज 50 वोट से चुनाव हार गए। यहां खास बात यह रही कि NOTA को 52 वोट मिले।

वार्ड 18 में कांग्रेस के मितेश वैष्णव करीब 59 वोट के अंतर से हार गए।

वार्ड 23 में कांग्रेस के चेतन लोहार को 92 वोट से हार का सामना करना पड़ा।

वार्ड 25 में कांग्रेस को 1807 और भाजपा को 1839 वोट मिले। यानी यहां हार का अंतर सिर्फ 32 वोट रहा।

वार्ड 75 में भी कांग्रेस 51 वोट से चुनाव हार गई।

इस तरह इन पांच वार्डों में कांग्रेस की कुल हार का अंतर 284 वोट रहा। ये नतीजे बताते हैं कि इन सीटों पर बूथ प्रबंधन, अंतिम समय की चुनावी रणनीति और वोटों का मामूली बिखराव भी निर्णायक हो सकता था।

बागियों ने कई वार्डों में बिगाड़ा कांग्रेस का गणित

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती कई जगह अपने ही खेमे से आई।

वार्ड 14 में कांग्रेस से बागी हुए विजय शंकर कुमावत को 609 वोट मिले। कांग्रेस को 1244 और भाजपा को 1752 वोट मिले। बागी प्रत्याशी के वोटों ने मुकाबले के समीकरण को प्रभावित किया।

वार्ड 54 में कांग्रेस को 562 वोट मिले, जबकि भाजपा को 1158 और कांग्रेस से बागी देवेंद्र माली को 953 वोट मिले। यहां बागी प्रत्याशी के वोट कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी से भी काफी ज्यादा रहे।

वार्ड 57 में कांग्रेस को 1005 और भाजपा को 1384 वोट मिले, जबकि कांग्रेस से बागी गीता सुहालका को 443 वोट मिले।

वार्ड 61 में बगावत का असर सबसे स्पष्ट दिखाई दिया। कांग्रेस ने सीमा डांगी को अधिकृत प्रत्याशी बनाया था, जिन्हें 872 वोट मिले। वहीं कांग्रेस से बागी हुईं इंदिरा डांगी ने 1846 वोट लेकर जीत दर्ज की।

वार्ड 66 में कांग्रेस के बागी संजय भगतानी को 571 वोट मिले। कांग्रेस को 1078 और भाजपा को 1638 वोट मिले।

इन आंकड़ों से यह साफ है कि कई सीटों पर कांग्रेस को पार्टी के भीतर से निकले उम्मीदवारों की चुनौती का सामना करना पड़ा। हालांकि केवल परिणामों के आधार पर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि बागी उम्मीदवारों को मिले सभी वोट कांग्रेस के ही थे।

निर्दलीयों ने भी कई जगह बनाया मुकाबला रोचक

कुछ वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवार भी महत्वपूर्ण भूमिका में नजर आए।

वार्ड 34 में निर्दलीय सामाजिक कार्यकर्ता दूसरे स्थान पर रहीं।
वार्ड 45 में भी निर्दलीय प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहा।
वार्ड 71 में निर्दलीय भैरूलाल सुथार दूसरे स्थान पर रहे।

इन सीटों पर निर्दलीयों की मजबूत मौजूदगी ने मुकाबले को बहुकोणीय बनाया और कांग्रेस के लिए चुनौती बढ़ाई।

BAP ने चार वार्डों में बनाया त्रिकोणीय मुकाबला

भारत आदिवासी पार्टी यानी BAP ने भी कुछ वार्डों में मजबूत प्रदर्शन किया।

वार्ड 10 में कांग्रेस को 647, भाजपा को 1430 और BAP को 1243 वोट मिले।

वार्ड 12 में कांग्रेस को 774, भाजपा को 1798 और BAP को 1352 वोट मिले।

वार्ड 41 में कांग्रेस को 2239 और भाजपा को 2601 वोट मिले, जबकि BAP को 507 वोट प्राप्त हुए।

वार्ड 70 में कांग्रेस को 1297, भाजपा को 1932 और BAP को 574 वोट मिले।

इन चार वार्डों में BAP एक महत्वपूर्ण तीसरे खिलाड़ी के रूप में सामने आई। हालांकि BAP को मिले वोट सीधे कांग्रेस के वोट बैंक से ही आए, यह परिणामों के आधार पर निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। इसके लिए बूथवार आंकड़ों और पिछले चुनावों के परिणामों से तुलना जरूरी होगी।

टिकट चयन भी बना कांग्रेस के लिए चुनौती

परिणामों के बाद कांग्रेस के उम्मीदवार चयन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

वार्ड 24 में भाजपा के मजबूत उम्मीदवार पारस सिंघवी के सामने कांग्रेस की दीपिका कुमावत चुनाव मैदान में थीं।

वार्ड 26, 27 और 28 में कांग्रेस भाजपा को मजबूत चुनौती नहीं दे सकी।

वार्ड 29 में भी कांग्रेस का चुनावी प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा।

वार्ड 33 में कांग्रेस भाजपा के मुकाबले पिछड़ गई।

वार्ड 34 में कांग्रेस को भाजपा के साथ मजबूत निर्दलीय प्रत्याशी की भी चुनौती मिली और कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही।

वार्ड 35 और 36 में भी कांग्रेस प्रत्याशी भाजपा को चुनौती देने में सफल नहीं रहे।

वार्ड 45 में भाजपा के मजबूत उम्मीदवार दिनेश भट्ट के सामने कांग्रेस ने पंकज सुखवाल को उतारा, जबकि निर्दलीय प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहा।

वार्ड 51 में भाजपा के दिग्गज नेता प्रमोद सामर के सामने कांग्रेस किसी बड़े राजनीतिक चेहरे को मैदान में नहीं उतार सकी।

वार्ड 60 में भाजपा से बागी हुईं खुशबू मेहता ने 1852 वोट हासिल किए। इसके बावजूद भाजपा प्रत्याशी जीत गया। कांग्रेस इस वोट विभाजन का फायदा नहीं उठा सकी।

वार्ड 64 में भाजपा से बागी दीपक व्यास को 1790 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी ने 1951 वोट लेकर जीत दर्ज की। कांग्रेस यहां सिर्फ 501 वोट तक सिमट गई।

यह दोनों वार्ड यह भी बताते हैं कि प्रतिद्वंद्वी दल में बगावत होना अपने आप में कांग्रेस की जीत की गारंटी नहीं बन सकता। वोटों को अपने पक्ष में खींचने के लिए मजबूत प्रत्याशी और प्रभावी संगठन भी जरूरी है।

कांग्रेस की हार की चार बड़ी वजहें

वार्डवार परिणामों को जोड़कर देखें तो कांग्रेस की हार के पीछे चार प्रमुख कारण सामने आते हैं—

1. बगावत: वार्ड 14, 54, 57, 61 और 66 में कांग्रेस से जुड़े बागी उम्मीदवारों ने पार्टी के चुनावी समीकरण को प्रभावित किया। वार्ड 61 में तो बागी प्रत्याशी ने अधिकृत कांग्रेस प्रत्याशी को पीछे छोड़कर जीत हासिल की।

2. BAP का प्रभाव: वार्ड 10, 12, 41 और 70 में BAP ने मुकाबले को त्रिकोणीय बनाया।

3. टिकट चयन: कई वार्डों में कांग्रेस प्रत्याशियों का चुनावी प्रदर्शन कमजोर रहा, जिसके बाद टिकट वितरण की रणनीति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

4. करीबी मुकाबलों में संगठनात्मक चूक: वार्ड 5, 18, 23, 25 और 75 में कांग्रेस 100 से भी कम वोटों से हार गई। इन पांच सीटों पर कुल हार का अंतर सिर्फ 284 वोट रहा।

आंकड़ों में कांग्रेस की चूक

  • 5 वार्ड 100 से कम वोटों के अंतर से हारे।
  • इन पांच सीटों पर संयुक्त हार का अंतर 284 वोट रहा।
  • 4 वार्डों में BAP प्रमुख तीसरे खिलाड़ी के रूप में उभरी।
  • कांग्रेस बागी/निर्दलीय के प्रभाव वाले कम से कम 8 वार्ड सामने आते हैं।
  • 15 वार्डों में टिकट चयन या चुनावी रणनीति पर सवाल उठते हैं।
  • वार्ड 60 और 64 में भाजपा के बागियों ने बड़ी संख्या में वोट लिए, लेकिन कांग्रेस उसका फायदा नहीं उठा सकी।

पंचायती राज चुनाव के लिए कांग्रेस को क्या सबक लेना चाहिए?

उदयपुर निकाय चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए स्पष्ट चेतावनी हैं। पंचायतीराज चुनाव में पार्टी को टिकट वितरण, बगावत और बूथ प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है
टिकट देने से पहले स्थानीय जनाधार और जीतने की क्षमता का आकलन हो। नाराज दावेदारों को समय रहते मनाकर बगावत रोकनी होगी। निर्दलीयों के प्रभाव वाले क्षेत्रों में अलग रणनीति बनानी होगी। करीबी मुकाबले वाली सीटों पर बूथ स्तर का संगठन मजबूत करना होगा।
पंचायत चुनाव में बड़े नेताओं से ज्यादा स्थानीय और स्वीकार्य चेहरे को प्राथमिकता देनी होगी। हर पंचायत समिति और जिला परिषद क्षेत्र का वार्ड/बूथवार राजनीतिक विश्लेषण पहले से तैयार होना चाहिए।

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